अध्याय 2 : संरचना तथा भूआकृति विज्ञान

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संरचना तथा भूआकृति

 

 चट्टानें व मिट्टी आपस में संबंधित हैं क्योंकि असंगठित चट्टानें वास्तव में मिट्टियाँ ही हैं। पृथ्वी के धरातल पर चट्टानों व मिट्टियों में भिन्नता धरातलीय स्वरूप के अनुसार पाई जाती है। वर्तमान अनुमान के अनुसार पृथ्वी की आयु लगभग 46 करोड़ वर्ष है। इतने लम्बे समय में अंतर्जात व बहिर्जात बलों से अनेक परिवर्तन हुए हैं। इन बलों की पृथ्वी की धरातलीय व अधस्तलीय आकृतियों की रूपरेखा निर्धारण में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

करोड़ों वर्ष पहले ‘इंडियन प्लेट’ भूमध्य रेखा से दक्षिण में स्थित थी। यह आकार में काफी विशाल थी और ‘आस्ट्रेलियन प्लेट’ इसी का हिस्सा थी । करोड़ों वर्षों के दौरान, यह प्लेट काफी हिस्सों में टूट गई और आस्ट्रेलियन प्लेट दक्षिण-पूर्व तथा इंडियन प्लेट उत्तर दिशा में खिसकने लगी।

इंडियन प्लेट का खिसकना अब भी जारी है और इसका भारतीय उपमहाद्वीप के भौतिक पर्यावरण पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव है।

भारतीय उपमहाद्वीप की वर्तमान भूवैज्ञानिक संरचना व इसके क्रियाशील भूआकृतिक प्रक्रम मुख्यत: अंतर्जनित व बहिर्जनिक बलों व प्लेट के क्षैतिज संचरण की अंतःक्रिया के परिणामस्वरुप अस्तित्व में आएँ हैं।

 

 

भूवैज्ञानिक संरचना व शैल समूह की भिन्नता के आधार पर भारत को तीन भूवैज्ञानिक खंडों में विभाजित किया जाता है जो भौतिक लक्षणों पर आधारित

(क) प्रायद्वीपीय खंड

(ख) हिमालय और अतिरिक्त प्रायद्वीपीय पर्वत मालाएँ

(ग) सिंधु – गंगा – ब्रह्मपुत्र मैदान

 

 

क) प्रायद्वीपीय खंड

 

प्रायद्वीपीय खंड का विस्तार

प्रायद्वीप खंड की उत्तरी सीमा कटी-फटी है, जो कच्छ से आरंभ होकर अरावली पहाड़ियों के पश्चिम से गुजरती हुई दिल्ली तक और फिर यमुना व गंगा नदी के समानांतर राजमहल की पहाड़ियों व गंगा डेल्टा तक जाती है। इसके अतिरिक्त उत्तर-पूर्व में कर्बी ऐंगलॉग (Karbi Anglong) व मेघालय का पठार तथा पश्चिम में राजस्थान भी इसी खंड के विस्तार हैं। पश्चिम बंगाल में मालदा भ्रंश उत्तरी-पूर्वी भाग में स्थित मेघालय व कर्बी ऐंगलॉग पठार को छोटा नागपुर पठार से अलग करता है। राजस्थान में यह प्रायद्वीपीय खंड मरुस्थल व मरुस्थल सदृश्य स्थलाकृतियों से ढका हुआ है।

 

प्रायद्वीपीय खंड मुख्यत:

प्राचीन नाइस व ग्रेनाईट से बना है। कैम्ब्रियन कल्प से यह भूखंड एक कठोर खंड के रूप में खड़ा है। इंडो-आस्ट्रेलियन प्लेट का हिस्सा होने के कारण यह उर्ध्वाधर हलचलों व खंड भ्रंश से प्रभावित है। नर्मदा, तापी और महानदी की रिफ्ट घाटियाँ और सतपुड़ा ब्लॉक पर्वत इसके उदाहरण हैं ।

प्रायद्वीप में मुख्यतः अवशिष्ट पहाड़ियाँ शामिल हैं, जैसे अरावली, – नल्लामाला, जावादी, वेलीकोण्डा, पालकोण्डा श्रेणी और महेंद्रगिरी पहाड़ियाँ आदि। यहाँ की नदी घाटियाँ उथली और उनकी प्रवणता कम होती है।

 

 

ख) हिमालय और अन्य अतिरिक्त प्रायद्वीपीय पर्वतमालाएँ

 

संरचना : तरूण, दुर्बल और लचीली है। ये पर्वत वर्तमान समय में भी बहिर्जनिक तथा अंतर्जनित बलों की अंतर्क्रियाओं से प्रभावित हैं। इसके परिणामस्वरूप इनमें वलन, भ्रंश और क्षेप (thrust) बनते हैं। तेज बहाव वाली नदियों से अपरदित ये पर्वत अभी भी युवा अवस्था में हैं। गॉर्ज, V-आकार घाटियाँ, क्षिप्रिकाएँ व जल प्रपात इत्यादि इसका प्रमाण हैं।

 

ग) सिंधु – गंगा – बह्मपुत्र मैदान

यह एक भू-अभिनति गर्त है जिसका निर्माण मुख्य रूप से हिमालय पर्वतमाला निर्माण प्रक्रिया के तीसरे चरण में लगभग 6.4 करोड़ वर्ष पहले हुआ था। इन मैदानों में जलोढ़ की औसत गहराई 1000 से 2000 मीटर है।

भारतीय उपमहाद्वीप में भूवैज्ञानिक और भूआकृतिक प्रक्रियाओं का यहाँ की भूआकृति एवं उच्चावच पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पाया जाता है।

 

 

भूआकृति

किसी स्थान की भूआकृति, उसकी संरचना, प्रक्रिया और विकास की अवस्था का परिणाम है। भारत में धरातलीय विभिन्नताएँ बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। इसके उत्तर में एक बड़े क्षेत्र में ऊबड़-खाबड़ स्थलाकृति है। इसमें हिमालय पर्वत श्रृंखलाएँ हैं दक्षिण भारत एक स्थिर परंतु कटा-फटा पठार जहाँ अपरदित चट्टान खंड और कगारों की भरमार है।

 

भारत को निम्नलिखित भूआकृतिक खंडों में बाँटा जा सकता है।

(1) उत्तर तथा उत्तरी-पूर्वी पर्वतमाला;

(2) उत्तरी भारत का मैदान;

(3) प्रायद्वीपीय पठार;

(4) भारतीय मरुस्थल;

(5) तटीय मैदान;

(6) द्वीप समूह

 

 

 

1) उत्तर तथा उत्तरी-पूर्वी पर्वतमाला

 

हिमालय में कई समानांतर पर्वत श्रृंखलाएँ हैं। इसमें बृहत हिमालय, पार हिमालय श्रृंखलाएँ, मध्य हिमालय और शिवालिक प्रमुख श्रेणियाँ हैं। भारत के उत्तरी-पश्चिमी भाग में हिमालय की ये श्रेणियाँ उत्तर-पश्चिम दिशा से दक्षिण-पूर्व दिशा की ओर फैली हैं।

दार्जिलिंग और सिक्किम क्षेत्रों में ये श्रेणियाँ पूर्व-पश्चिम दिशा में फैली हैं अरुणाचल प्रदेश में ये दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पश्चिम की ओर घूम जाती हैं। मिजोरम, नागालैंड और मणिपुर में ये पहाड़ियाँ उत्तर-दक्षिण दिशा में फैली हैं। बृहत हिमालय श्रृंखला, जिसे केंद्रीय अक्षीय श्रेणी भी कहा जाता है, की

 

पूर्व-पश्चिम लंबाई लगभग 2500 किलोमीटर तथा उत्तर से दक्षिण इसकी चौड़ाई 160 से 400 किलोमीटर है। हिमालय एक प्राकृतिक रोधक ही नहीं अपितु जलवायु. अपवाह और सांस्कृतिक विभाजक भी हैं।

 

उच्चावच पर्वत श्रेणियों के सरेखण और दूसरी भूआकृतियों के आधार पर हिमालय को निम्नलिखित उपखंडों में विभाजित किया जा सकता है।

 

 

(i) कश्मीर या उत्तरी-पश्चिमी हिमालय;  

  • इसमे काराकोरम, जास्कर, लद्दाख, पीरपंजाल आदि प्रमुख पर्वत श्रेणियां हैं।
  • कश्मीर हिमालय में स्थित  लद्दाख एक शीत मरुस्थल है।
  • यह वृहद् हिमालय तथा काराकोरम श्रेणियों के बीच स्थित है।
  • जोजिला, बनिहाल, फोतुला, खार्दुग ला आदि प्रमुख दर्रें हैं। इस क्षेत्र में डल झील तथा वुलर झील ताजे जल की झीलें हैं, जबकि पांगोंग तथा सोमुरीरी झीलों का जल लवणयुक्त है।
  • सिंधु तथा इसकी सहायक नदियाँ-झेलम तथा चेनाब इस क्षेत्र से। अपवाहित होती हैं। लेह में जास्कर नदी सिंधु नदी से मिलती है।
  • वैष्णो देवी, अमरनाथ गुफा तथा चरार-ए-शरीफ जैसे प्रमुख तीर्थ स्थल इसी क्षेत्र में अवस्थित है।
  • इसके दक्षिणी भाग में अनुदैर्घ्य ( Longitudinal ) घाटियाँ पाई जाती हैं, जिन्हें ‘ दून ‘ कहा जाता है ; जिनमें जम्मू-दून और पठानकोट दून प्रमुख हैं।

 

 

(ii) हिमाचल और उत्तरांचल हिमालय;

  • हिमालय का यह हिस्सा पश्चिम में रावी नदी और पूर्व में काली नदी ( घाघरा की सहायक नदी ) के बीच स्थित है।
  • इस खंड में हिमालय की तीनों मुख्य पर्वत श्रृंखलाएँ-वृहद् हिमालय, लघु हिमालय ( जिन्हें हिमाचल प्रदेश में’धौलाधर’और उत्तराखंड में’नागटिब्बा’कहा जाता है ) तथा शिवालिक श्रेणियाँ स्थित हैं।
  • इस क्षेत्र की दो प्रमुख स्थलाकृतियाँ शिवालिक और दून हैं, जैसे-चंडीगढ़-कालका दून, नालागढ़ दून, देहरादून, हरीके दून तथा कोटा दून इत्यादि। इनमें’देहरादून’सबसे बड़ी घाटी है।
  • भारत की तीसरी सर्वोच्च ‘चोटी’ नंदा देवी कुमाऊँ हिमालय का ही भाग है
  • वृहद् हिमालय की घाटियों में’भोटिया’नामक खानाबदोश समुदाय के लोग रहते हैं, जो ऋतुप्रवास करते हैं। ये ग्रीष्म काल में’बुग्याल’( ऊँचाई पर स्थित घास के मैदान ) में चले जाते हैं और शरद ऋतु  में घाटियों में लौट आते हैं।

 

(iii) दार्जिलिंग और सिक्किम हिमालय;

  • यह पश्चिम में नेपाल हिमालय तथा पूर्व में भूटान हिमालय के बीच स्थित है। यह क्षेत्र कंचनजंगा जैसी ऊँची चोटियों, गहरी घाटियों तथा तेज बहाव वाली नदियों के लिये प्रसिद्ध है।
  • इस पर्वतीय क्षेत्र के उत्तरी उच्च भाग में ‘लेपचा‘ नामक जनजाति निवास करती है जबकि निम्न दक्षिणी भाग ( विशेषतया दार्जिलिंग हिमालय ) में नेपाली, बंगाली तथा मध्य भारत की जनजातियों का मिश्रण पाया जाता है।
  • यहाँ पर शिवालिक की पहाड़ियाँ नहीं हैं परंतु उनके स्थान पर ‘दुआरे’ स्थलाकृतियाँ पाई जाती हैं, जिनका प्रयोग चाय बागानों के लिये होता है।

 

 

(iv) अरुणाचल हिमालय;

  • यह क्षेत्र पश्चिम में भूटान हिमालय से लेकर पूर्व में दिफू दर्रें तक फैला हुआ है। नामचा बारवा तथा कांगतो इसकी दो प्रमुख चोटियाँ हैं।
  • इस क्षेत्र में बहुत सी जनजातियाँ निवास करती हैं, जिनमें मोनपा, डफला, अबोर, मिश्मी, निशि तथा नागा प्रमुख हैं।
  • अधिकांश जनजातियाँ झूम कृषि करती हैं, इन्हें स्थानांतरी अथवा स्लैश और बर्न कृषि भी कहा जाता है।

 

 

(v) पूर्वी पहाड़ियाँ और पर्वत

  • ये हिमालय के सुदूर पूर्व में अरुणाचल हिमालय के दक्षिण में स्थित पहाड़ियाँ एवं पर्वत है, जिनकी दिशा उत्तर से दक्षिण की ओर है।
  • उत्तर में ये पटकाई बुम, नागा पहाड़ियाँ, मणिपुर पहाड़ियाँ और दक्षिण में मिजो और लुसाई पहाड़ियों के नाम से प्रसिद्ध हैं। 
  • यहाँ के पहाड़ी इलाके में रहने वाली जनजातियाँ झूम अथवा स्थानांतरी कृषि करती हैं।
  • यहाँ प्रवाहित होने वाली बराक नदी, मणिपुर एवं मिजोरम की मुख्य नदी है। 
  • मणिपुर घाटी के मध्य ‘लोकटक झील‘ स्थित है और यह चारों ओर से पहाड़ियों से घिरी हुई है।
  • मिज़ोरम जिसे ‘मोलेसिस बेसिन‘भी कहा जाता है, कोमल तथा असंगठित चट्टानों से निर्मित है।

 

 

2 ) उत्तरी भारत का मैदान

उत्तरी भारत का मैदान सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा बहाकर लाए गए जलोढ़ निक्षेप से बना है। इस मैदान की पूर्व से पश्चिम लंबाई लगभग 3200 किलो मीटर है। इसकी औसत चौड़ाई 150 से 300 किलोमीटर है। जलोढ़ निक्षेप की अधिकतम गहराई 1000 से 2000 मीटर है।

 

इन मैदानों को तीन भागों में बाँट सकते हैं;

 

भाबर :

हिमालय से निकलने वाली कुछ महत्वपूर्ण नदियाँ पर्वतों से नीचे उतरते समय शिवालिक की ढाल पर 8 से 16 किलोमीटर की चौड़ी पट्टी में गुटिका का निक्षेपण करती हैं। इससे एक मैदान का निर्माण होता है। इसे ‘भाबर’ कहा जाता है। यह एक उपजाऊ मैदान है।

 

तराई 

शिवालिक की ढाल से होकर आने वाली सभी नदी प्रणालियाँ भाबर पट्टी में विलुप्त हो जाती है। इस पट्टी के दक्षिण में ये सरिताएँ और नदियाँ फिर से निकल आती हैं। इससे एक नम और दलदली क्षेत्र का निर्माण होता है। इस क्षेत्र को ‘तराई’ के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र में घने जंगल हैं और वहाँ वन्य प्राणी निवास करते हैं। भारत और पाकिस्तान का बँटवारा होने के पश्चात् पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को कृषि योग्य भूमि देने की आवश्यकता थी। अतः कृषि योग्य भूमि उपलब्ध कराने के लिए इस जंगल के बहुत से भाग को काटा जा चुका है।

 

 

जलोढ़ मैदान 

जलोढ़ मैदान को आगे दो भागों में बाँटा जाता है- खादर और बाँगर  इस मैदान में नदी की प्रौढ़ावस्था में बनने वाली अपरदनी और निक्षेपण स्थलाकृतियाँ, जैसे बालू-रोधिका विसर्प, गोखुर झीलें और गुफित नदियाँ पाई जाती हैं। उत्तर भारत के मैदान में बहने वाली विशाल नदियाँ अपने मुहाने पर विश्व के बड़े-बड़े डेल्टाओं का निर्माण करती हैं, जैसे- सुंदर वन डेल्टा ।

 

बाँगर : भांगर उत्तरी मैदान का सबसे विशालतम भाग है। इसका निर्माण पुराने जलोढ़ से हुआ है। यह क्षेत्र नदियों के बाढ़ वाले मैदान के ऊपर अवस्थित है। यह वेदिका जैसी आकृति प्रदर्शित करता है। इस क्षेत्र की मिट्टी में चूनेदार निक्षेप पाए जाते हैं। इस निक्षेप को स्थानीय भाषा में ‘कंकड़’ कहा जाता है।

 

खादर : बाढ़ वाले मैदानों के नये और युवा निक्षेपों को ‘खादर’ के नाम से जाना जाता है। ये उपजाऊ मैदान होते हैं। लगभग प्रत्येक वर्ष बाढ़ आने के कारण इनका पुनर्निर्माण होता है। ये क्षेत्र गहन खेती के लिए आदर्श हैं। उपजाऊ मैदान होने के कारण यहाँ बड़ी संख्या में लोग कृषि कार्य में लगे हुए हैं।

 

3) प्रायद्वीपीय पठार

 

नदियों के मैदान से 150 मीटर ऊँचाई से ऊपर उठता हुआ प्रायद्वीपीय पठार तिकोने आकार वाला कटा-फटा भूखंड है, जिसकी ऊँचाई 600 से 900 मीटर है।

उत्तर पश्चिम में दिल्ली, कटक (अरावली विस्तार) पूर्व में राजमहल पहाड़ियाँ, पश्चिम में गिर पहाड़ियाँ और दक्षिण में इलायची (कार्डामम) पहाड़ियाँ, प्रायद्वीप पठार की सीमाएँ निर्धारित करती हैं।

प्रायद्वीपीय भारत अनेक पठारों से मिलकर बना है, जैसे- हजारीबाग पठार, पालायु पठार, रांची पठार, मालवा पठार, कोयम्बटूर पठार और कर्नाटक पठार |

इस क्षेत्र की मुख्य प्राकृतिक स्थलाकृतियों में टॉर, ब्लॉक पर्वत, भ्रंश घाटियाँ, पर्वत स्कंध, नग्न चट्टान संरचना, टेकरी (hummocky) पहाड़ी श्रृंखलाएँ और क्वार्ट्जाइट भित्तियाँ (dykes) शामिल हैं जो प्राकृतिक जल संग्रह के स्थल हैं। इस पठार के पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भाग में मुख्य रूप से काली मिट्टी पाई जाती है।

मुख्य उच्चावच लक्षणों के अनुसार प्रायद्वीपीय पठार को तीन भागों में बाँटा जा सकता है।

 

(i) दक्कन का पठार;

यह नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित है। इस त्रिभुज के आकार का है। इसके उत्तरी हिस्से में सतपुरा श्रृंखला और और उत्तर पश्चिम में अरावली है। पूर्वी हिस्से में महादेव, कैमूर पहाड़ी और मैकाल श्रृंखला है। दक्कन के पठार की ढ़ाल पश्चिम से पूर्व की ओर है। यह पूर्वोत्तर में मेघालय, कार्बी-ऐंगलोंग तथा उत्तरी कचार पहाड़ी तक फैला है। इस क्षेत्र की मुख्य श्रृंखलाएँ (पश्चिम से पूर्व की ओर) गारो, खासी और जयंतिया हैं।

 

 

(ii) मध्य उच्च भूभाग;

यह नर्मदा नदी के उत्तर में स्थित है। यह मालवा के पठार के अधिकतर भागों में फैला है। इस क्षेत्र की नदियाँ दक्षिण पश्चिम से पूर्व उत्तर की ओर बहती हैं, जिससे इस क्षेत्र की ढ़ाल का पता चलता है। यह पश्चिम में चौड़ा और पूर्व में पतला है। इस पठार के पूर्वी प्रसार को बुंदेलखंड या बघेलखंड के नाम से जाना जाता है। उसके आगे पूर्व में यह छोटानागपुर पठार तक फैला हुआ है।

 

(iii) उत्तरी-पूर्वी पठार

प्रायद्वीपीय पठार का एक भाग जिसे ‘मेघालय’ तथा ‘कार्बी ऐंगलोंग’ पठार के नाम से जाना जाता है। हिमालय की उत्पति के समय भारतीय प्लेट उत्तर पूर्व दिशा में खिसकने से आपार ऊर्जा के उत्सर्जन के कारण यह पठार एक भ्रंश ( मालदा दर्रा ) के द्वारा छोटानागपुर के पठार से अलग हो गया। इस पठार को यहाँ पर पाए जाने वाले जनजातियों के आधार पर पश्चिम से पूर्व की ओर गारो, खासी तथा जयंतिया तीन महत्वपूर्ण पर्वत शृंखलाएँ पाई जाती है।

 

 

 

4) भारतीय मरुस्थल

विशाल भारतीय मरुस्थल अरावली पहाड़ियों से उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह एक ऊबड़-खाबड़ भूतल है जिस पर बहुत से अनुदैर्ध्य रेतीले टीले और बरखान पाए जाते हैं। यहाँ पर वार्षिक वर्षा 150 मिलीमीटर से कम होती है और परिणामस्वरूप यह एक शुष्क और वनस्पति रहित क्षेत्र है। इन्ही स्थलाकृतिक गुणों के कारण इसे ‘मरुस्थली’ के नाम से जाना जाता है।

यहाँ की प्रमुख स्थलाकृतियाँ स्थानांतरी रेतीले टीले, छत्रक चट्टानें और मरुउद्यान (दक्षिणी भाग में) हैं। ढाल के आधार पर मरुस्थल को दो भागों में बाँटा जा सकता है-

सिंध की ओर ढाल वाला उत्तरी भाग और कच्छ के रन की ओर ढाल वाला दक्षिणी भाग। यहाँ की अधिकतर नदियाँ अल्पकालिक हैं। मरुस्थल के दक्षिणी भाग में बहने वाली लूनी नदी महत्त्वपूर्ण है।

 

5) तटीय मैदान

भारत की तट रेखा बहुत लंबी है। स्थिति और सक्रिय भूआकृतिक प्रक्रियाओं के आधार पर तटीय मैदानों को दो भागों में बाँटा जा सकता है;

 

(i) पश्चिमी तटीय मैदान

इस मैदान का विस्तार गुजरात से लेकर कन्याकुमारी तक अरब सागर तथा पश्चिमी घाट के मध्य है। इस मैदान को उत्तर से दक्षिण की ओर कई भागो में बांटा जाता है। जैसे:-कच्छ और काठियावाड़ का मैदान ( गुजरात )कोंकण का मैदान ( महाराष्ट्र )गोवा तटीय मैदान ( गोवा )कन्नड़ तटीय मैदान ( कर्नाटक )मालाबार तटीय मैदान ( कर्नाटक तथा केरल )

पश्चिमी तटीय मैदान उत्तर तथा दक्षिण में चौड़ी तथा मध्य में संकरा है। गुजरात में सर्वाधिक चौड़ी तथा कन्नड़ तटीय मैदान सर्वाधिक संकरा है। इसकी चौड़ाई 10 से 80 किमी के मध्य है। इसकी औसत उचाई 150 से 300 मीटर है। इस क्षेत्र में प्रवाहित होने वाली नदियाँ छोटी तथा तीव्रगामी होती है। नर्मदा और ताप्ती दो प्रमुख बड़ी नदियाँ प्रवाहित होती है।

 

 

(ii) पूर्वी तटीय मैदान ।

इसका विस्तार भारत के पूर्व में पूर्वी घाट तथा बंगाल की खाड़ी में मध्य गंगा के मुहाने से लेकर कन्याकुमारी तक फैला हुआ है। इस मैदान का क्षेत्रफल लगभग 1 लाख 3 हजार वर्ग किमी है इसकी चौड़ाई 100 से 120 किमी तक है। इस मैदान को उत्तर से दक्षिण की ओर उत्कल तट, उत्तरी सरकार तट, तथा कोरोमंडल तट के नाम से जाना जाता है।

बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ अपने मुहाने पर लम्बे चौड़े डेल्टा का निर्माण करती है। इसमें स्वर्णरेखा, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, और कावेरी नदियों के डेल्टाई क्षेत्र उभरा तट होने के कारण यहाँ पत्तन और पोताश्रय कम पाए जाते है तथा महाद्वीपीय मग्न तट की चौड़ाई लगभग 500 किमी तक पाया जाता है। इसकी चौड़ाई पश्चिमी तटीय मैदान की चौड़ाई से अधिक है

 

 

 

6 )द्वीप समूह

भारत में दो प्रमुख द्वीप समूह हैं-
एक बंगाल की खाड़ी मे दूसरा अरब सागर में बंगाल की खाड़ी के द्वीप समूह में लगभग 572 द्वीप हैं। ये द्वीप 6° उत्तर से 14° उत्तर और 92° पूर्व से 94° पूर्व के बीच स्थित हैं। रीची द्वीप समूह और लबरीन्थ द्वीप, यहाँ के दो प्रमुख द्वीप समूह हैं।

बंगाल की खाड़ी के द्वीपों को दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है- उत्तर में अंडमान और दक्षिण में निकोबार ये द्वीप, समुद्र में जलमग्न पवर्ती का हिस्सा है। कुछ छोटे द्वीपों की उत्पत्ति ज्वालामुखी से भी जुड़ी है।

बैरन आइलैंड नामक भारत का एकमात्र जीवंत ज्वालामुखी भी निकोबार द्वीपसमूह में स्थित है। यह द्वीप असंगठित कंकड़, पत्थरों और गोलाश्मों से बना हुआ है।

इस द्वीप समूह की मुख्य पर्वत चोटियों में सैडल चोटी (उत्तरी अंडमान 738 मीटर) माउंट डियोवोली (मध्य अंडमान 515 मीटर), माउंट कोयोब (दक्षिणी अंडमान – 460 मीटर) और माउंट थुईल्लर (ग्रेट निकोबार 642 मीटर) शामिल है।

 

 

 

 

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