अध्याय 4 : महासागरों और महाद्वीपो का विवरण

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महाद्वीपीय प्रवाह

 

तटरेखा में सममिति (Symmetry)

वैज्ञानिकों ने दक्षिण व उत्तर अमेरिका तथा यूरोप व अफ्रीका के एक साथ जुड़े होने की संभावना को व्यक्त किया। सन् 1596 में एक डच मानचित्रवेत्ता अब्राहम ऑस्टेलियस (Abraham Ortelius) ने सर्वप्रथम इस संभावना को व्यक्त किया था। एन्टोनियो पैलेग्रीनी ने एक मानचित्र बनाया, जिसमें तीनों महाद्वीपों को इकट्ठा दिखाया गया था।

 

 

 महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत

 

जर्मन मौसमविद अल्फ्रेड वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत प्रस्तुत किया यह सिद्धांत महाद्वीप एवं महासागरों के वितरण से ही संबंधित था।

 

सिद्धान्त के अनुसार सभी महाद्वीप एक अकेले भूखंड में जुड़े हुए थे। वेगनर के अनुसार आज के सभी महाद्वीप इस भूखंड के भाग थे तथा यह एक बड़े महासागर से घिरा हुआ था।

 

पैंजिया :- उन्होंने इस बड़े महाद्वीप को पैंजिया (Pangaea) का नाम दिया। पैंजिया का अर्थ है- संपूर्ण पृथ्वी

पैंथालासा :- विशाल महासागर को पैंथालासा (Panthalassa) कहा, जिसका अर्थ है- जल ही जल

20 करोड़ वर्ष पहले इस बड़े महाद्वीप पैंजिया का विभाजन आरंभ हुआ। पैंजिया पहले दो बड़े महाद्वीपीय पिंडों लारेशिया (Laurasia) और गोंडवानालैंड (Gondwanaland) क्रमशः उत्तरी व दक्षिणी भूखंडों के रूप में विभक्त हुआ । इसके बाद लारेशिया व गोडवानालैंड धीरे-धीरे अनेक छोटे हिस्सों में बँट गए, जो आज के महाद्वीप के रूप हैं।

 

 

 महाद्वीपीय विस्थापन के पक्ष में प्रमाण

 

1) महाद्वीपों में साम्य

दक्षिण अमेरिका व अफ्रीका के आमने-सामने की तटरेखाएँ अद्भुत व त्रुटिरहित साम्य दिखाती हैं। 1964 ई0 में बुलर्ड (Bullard) ने एक कंप्यूटर प्रोग्राम की सहायता से अटलांटिक तटों को जोड़ते हुए एक मानचित्र तैयार किया था। तटों का यह साम्य बिल्कुल सही सिद्ध हुआ।

 

 

2) महासागरों के पार चट्टानों की आयु में समानता

रेडियोमिट्रिक काल निर्धारण (Radiometric dating) विधि से महासागरों के पार महाद्वीपों की चट्टानों के निर्माण के समय का अनुमान लगाया गया 200 करोड़ वर्ष प्राचीन शैल समूहों की एक पट्टी ब्राजील तट और पश्चिमी अफ्रीका के तट पर मिलती हैं, जो आपस में मेल खाती है।

 

3) टिलाइट

टिलाइट वे अवसादी चट्टानें हैं, जो हिमानी निक्षेपण से निर्मित होती हैं। भारत में पाए जाने वाले गोंडवाना श्रेणी के तलछटों के प्रतिरूप दक्षिण गोलार्ध के छः विभिन्न स्थलखंडों में मिलते हैं। इसी क्रम के प्रतिरूप भारत के अतिरिक्त अफ्रीका, फॉकलैंड द्वीप, मैडागास्कर, अंटार्कटिक और आस्ट्रेलिया में मिलते हैं।

 

4) प्लेसर निक्षेप

सोनायुक्त शिराएँ (Gold bearing veins) ब्राजील में पाई जाती हैं। अतः यह स्पष्ट है कि घाना में मिलने वाले सोने के निक्षेप ब्राजील पठार से उस समय निकले होंगे. जब ये दोनों महाद्वीप एक दूसरे से जुड़े थे।

 

 

 5) जीवाश्मों का वितरण

समुद्री अवरोधक के दोनों विपरीत किनारों पर जल व स्थल में पाए जाने वाले पौधों व जंतुओं की समान प्रजातियाँ पाई गयी है।

उदाहरण : लैमूर‘ भारत, मैडागास्कर व अफ्रीका में मिलते हैं. ने इन तीनों स्थलखंडों को जोड़कर एक सतत् स्थलखंड कुछ वैज्ञानिकों ‘लेमूरिया’ (Lemuria) की उपस्थिति को स्वीकारा।

मेसोसारस (Mesosaurus) नाम के छोटे रेंगने वाले जीव केवल उथले खारे पानी में ही रह सकते थे और यह दक्षिण अफ्रीका के दक्षिणी केप प्रांत और ब्राजील में इरावर शैल समूह में ही मिलते हैं। और यह दोनों स्थान 4800km की दूरी पर है।

 

 

 

प्रवाह संबंधी बल

 

वेगनर के अनुसार महाद्वीपीय विस्थापन के दो कारण थे:

(1) पोलर या ध्रुवीय फ्लीइंग बल

ध्रुवीय फ्लीइंग बल पृथ्वी के घूर्णन से संबंधित है। पृथ्वी की आकृति एक संपूर्ण गोले जैसी नहीं है; वरन् यह भूमध्यरेखा पर उभरी हुई है। यह उभार पृथ्वी के घूर्णन के कारण है।

 

(2) ज्वारीय बल

वह ज्वारीय बल है, जो सूर्य व चंद्रमा के आकर्षण से संबद्ध है, जिससे महासागरों में ज्वार पैदा होते हैं।

 

 

संवहन धारा सिद्धांत

1930 में आर्थर होम्स ने मैंटल (Mantle) भाग में संवहन धाराओं के प्रभाव की संभावना व्यक्त की। ये धाराएँ रेडियोएक्टिव तत्त्वों से उत्पन्न ताप भिन्नता से मेंटल भाग में उत्पन्न होती है। होम्स ने तर्क दिया कि पूरे मैंटल भाग में इस प्रकार की धाराओं का तंत्र विद्यमान है। यह उन प्रवाह बलों की व्याख्या प्रस्तुत करने का प्रयास था

 

 

 महासागरीय अधस्तल की बनावट

गहराई व उच्चावच के प्रकार के आधार पर,महासागरीय तल को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है ।

 

(1) महाद्वीपीय सीमा

ये महाद्वीपीय किनारों और गहरे समुद्री बेसिन के बीच का भाग है। इसमें महाद्वीपीय मग्नतट, महाद्वीपीय ढाल, महाद्वीपीय उभार और गहरी महासागरीय खाइयाँ आदि शामिल हैं।

 

(2) गहरे समुद्री बेसिन

ये विस्तृत मैदान महाद्वीपीय तटों व मध्य महासागरीय कटकों के बीच पाए जाते हैं। वितलीय मैदान, वह क्षेत्र है जहाँ महाद्वीपों से बहाकर लाए गए अवसाद इनके तटों से दूर निक्षेपित होते हैं।

 

(3) मध्य- महासागरीय कटक

मध्य महासागरीय कटक आपस में जुड़े हुए पर्वतों की एक श्रृंखला बनाती है। महासागरीय जल में डूबी हुई, यह पृथ्वी के धरातल पर पाई जाने वाली संभवतः सबसे लंबी पर्वत श्रृंखला है।

इन कटकों के मध्यवर्ती शिखर पर एक रिफ्ट, एक प्रभाजक पठार और इसकी लंबाई के साथ-साथ पार्श्व मंडल इसकी विशेषता है। मध्यवर्ती भाग में उपस्थित द्रोणी वास्तव में सक्रिय ज्वालामुखी क्षेत्र

 

 

 भूकंप व ज्वालामुखियों का वितरण

 

1) अटलांटिक महासागर के मध्यवर्ती भाग में, तट रेखा के लगभग समानांतर रेखा यह आगे हिंद महासागर तक जाती है। यह भारतीय उपमहाद्वीप के थोड़ा दक्षिण में यह दो भागों में बँट जाती है, जिसकी एक शाखा पूर्वी अफ्रीका को ओर चली जाती है और दूसरी मलमार से होती हुई न्यू गिनी पर एक ऐसी ही रेखा से मिल जाती

 

2) दूसरा क्षेत्र छायांकित मेखला (Shaded belt) के माध्यम से दिखाया गया है, जो अल्पाइन हिमालय (Alpine- Himalayan) श्रेणियों के और प्रशांत महासागरीय किनारों के समरूप है।

 

रिंग ऑफ फायर

प्रशांत महासागर के किनारों को सक्रिय ज्वालामुखी के क्षेत्र होने के कारण ‘रिंग ऑफ फायर’ ( Ring of fire) भी कहा जाता है

 

 

सागरीय अधस्तल का विस्तार

 

(1) मध्य महासागरीय कटकों के साथ-साथ ज्वालामुखी उद्गार सामान्य क्रिया है और ये उद्गार इस क्षेत्र में बड़ी मात्रा में लावा बाहर निकालते हैं

(ii) महासागरीय कटक के मध्य भाग के दोनों तरफ समान दूरी पर पाई जाने वाली चट्टानों के निर्माण का समय, संरचना, संघटन और चुंबकीय गुणों में समानता पाई जाती है।

iii) महासागरीय पर्पटी को चट्टाने महाद्वीपीय पर्पटी की चट्टानों को अपेक्षा अधिक नई है।

iv) गहरी खाइयों में भूकंप के उद्गम अधिक गहराई पर है। जबकि मध्य महासागरीय कटको के क्षेत्र में भूकंप उद्गम केंद्र (Focl) कम महराई पर विद्यमान हैं।

 

 

 

सागरीय अधस्तल विस्तार सिद्धान्त (1961)

 

हेस (Hess) के तर्कानुसार महासागरीय कटकों के शीर्ष पर लगातार ज्वालामुखी उद्भेदन से महासागरीय पर्पटी में विभेदन हुआ और नया लावा इस दरार को भरकर महासागरीय पर्पटी को दोनों तरफ धकेल रहा है। इस प्रकार अधस्तल का विस्तार हो रहा है।

 

 

 प्लेट विवर्तनिकी

 

सन् 1967 में मैक्कैनजी , पारकर और मोरगन अवधारणा प्रस्तुत की, जिसे ‘प्लेट विवर्तनिकी (Plate tectonics) कहा गया।  एक विवर्तनिक प्लेट (जिसे लिथोस्फेरिक प्लेट भी कहा जाता है), ठोस पान का विशाल व अनियमित आकार का खंड है,

 

जो महाद्वीपीय व महासागरीय स्थलमंडलों से मिलकर बना है। ये प्लेटें दुर्बलतामंडल (Asthenosphere) पर एक दृढ़ इकाई के रूप में क्षेतिज अवस्था में चलायमान है। स्थलमंडल में पर्पटी एवं ऊपरी मैटल को सम्मिलित किया जाता है, जिसकी मोटाई महासागरों में 5 से 100 किमी० और महाद्वीपीय भागों में लगभग 200 किमी) है।

 

एक प्लेट को महाद्वीपीय या महासागरीय प्लेट भी कहा जा सकता है

 

प्लेट विवर्तनिकी के सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी का स्थलमंडल सात मुख्य प्लेट व कुछ छोटी प्लेटों में विभक्त है।

 

 

प्रमुख प्लेटे

 

I) अंटार्कटिक प्लेट (जिसमें अंटार्कटिक और इसको चारों ओर से घेरती हुई महासागरीय प्लेट भी शामिल है)

II) उत्तर अमेरिकी प्लेट (जिसमें पश्चिमी अटलांटिक तल सम्मिलित है तथा दक्षिणी अमेरिकन प्लेट व कैरेबियन द्वीप इसकी सीमा का निर्धारण करते हैं)

(III) दक्षिण अमेरिकी प्लेट (पश्चिमी अटलांटिक तल समेत और उत्तरी अमेरिकी प्लेट व कैरेबियन द्वीप इसे पृथक करते हैं)

IV) प्रशांत महासागरीय प्लेट 

(V) इंडो-आस्ट्रेलियन-न्यूजीलैंड प्लेट

(VI) अफ्रीकी प्लेट (जिसमें पूर्वी अटलांटिक तट शामिल है)

(VII) यूरेशियाई प्लेट (जिसमें पूर्वी अटलांटिक महासागरीय तल सम्मिलित है)

 

 

कुछ महत्वपूर्ण छोटी प्लेटें

 

(i) कोकोस (Cocoas) प्लेट यह प्लेट मध्यवर्ती अमेरिका और प्रशांत महासागरीय प्लेट के बीच स्थित है।

(ii) नज़का प्लेट (Nazca plate) यह दक्षिण अमेरिका व प्रशांत महासागरीय प्लेट के बीच स्थित है।

(iii) अरेबियन प्लेट (Arabian plate) इसमें अधिकतर अरब प्रायद्वीप का भू-भाग सम्मिलित है।

(iv) फिलिपीन प्लेट (Phillippine plate) – यह एशिया महाद्वीप और प्रशांत महासागरीय प्लेट के बीच स्थित है।

(v) कैरोलिन प्लेट (Caroline plate) यह न्यू गिनी के उत्तर में फिलिपियन व इंडियन प्लेट के बीच स्थित है।

(vi) फ्यूजी प्लेट (Fuji plate) यह आस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्व में स्थित है।

 

 

प्लेट संचरण के फलस्वरूप तीन प्रकार की प्लेट सीमाएं बनती है।

 

1) अपसारी सीमा

जब दो प्लेट एक दूसरे से विपरीत दिशा में अलग हटती हैं और नई पर्पटी का निर्माण होता है। उन्हें अपसारी प्लेट कहते हैं।

वह स्थान जहाँ से प्लेट एक दूसरे से दूर हटती हैं. इन्हें प्रसारी स्थान (Spreading site) भी कहा जाता है। अपसारी सीमा का सबसे अच्छा उदाहरण मध्य-अटलांटिक कटक है।

 

 

2) अभिसरण सीमा

जब एक प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे धँसती है और जहाँ भूपर्पटी नष्ट होती है, वह अभिसरण सीमा है। वह स्थान जहाँ प्लेट धँसती हैं, इसे प्रविष्ठन क्षेत्र (Subduction zone) भी कहते हैं।

यह तीन प्रकार की होती है ।

(1) महासागरीय व महाद्वीपीय प्लेट के बीच

(2) दो महासागरीय प्लेटों के बीच

(3) दो महाद्वीपीय प्लेटों के बीच।

 

 

 3) रूपांतर सीमा

जहाँ न तो नई पर्पटी का निर्माण होता है और न ही पर्पटी का विनाश होता है, उन्हें रूपांतर सोमा कहते हैं। इसका कारण है कि इस सीमा पर प्लेटें एक दूसरे के साथ-साथ क्षैतिज दिशा में सरक जाती हैं।

 

रूपांतर अंश (Transform faults) दो प्लेट को अलग करने वाले तल हैं जो सामान्यतः मध्य महासागरीय कटकों से लंबवत स्थिति में पाए जाते हैं। क्योंकि कटकों के शीर्ष पर एक ही समय में सभी स्थानों पर ज्वालामुखी उद्गार नहीं होता,

 

 

 प्लेट प्रवाह दरें

प्रवाह की ये दरें बहुत भिन्न है। आर्कटिक कटक की प्रवाह दर सबसे कम है (2.5 सेंटीमीटर प्रति वर्ष से भी कम)। ईस्टर द्वीप के निकट पूर्वी प्रशांत महासागरीय उभार, जो चिली से 3,400 कि0मी0 पश्चिम की ओर दक्षिण प्रशांत महासागर में है. इसकी प्रवाह दर सर्वाधिक है (जो 5 से०मी०) प्रति वर्ष से भी अधिक है)।

 

 

प्लेट को संचलित करने वाले बल

 

ऐसा माना जाता है कि दृढ़ प्लेट के नीचे चलायमान चट्टानें वृत्ताकार रूप में चल रही हैं। उष्ण पदार्थ धरातल पर पहुँचता है, फैलता है और धीरे-धीरे ठंडा होता है फिर गहराई में जाकर नष्ट हो जाता है। यही चक्र बारंबार दोहराया जाता है और इसे संवहन प्रवाह (Convection flow) कहते हैं।
 दृढ़ प्लेटों के नीचे दुर्बल व उष्ण मैंटल है, जो प्लेट को प्रवाहित करता है।

 

 

 

 भारतीय प्लेट का संचलन

पूर्व की ओर 1 से 3 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष की दर से प्रवाहित होना प्रारम्भ हुआ। आज से लगभग 14 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप 50 डिग्री अक्षांश पर स्थित था। और लगभग 3 से 4 करोड़ वर्ष पूर्व यह यूरेशियाई प्लेट से टकराया।

भारतीय उपमहाद्वीप लगभग 7.1 करोड़ वर्ष पूर्व इसकी स्थिति लगभब 40 डिग्री दक्षिणी अक्षांश से 20 डिग्री अक्षांश के मध्य थी। लगभग 5.5 करोड़ वर्ष पूर्व इसकी स्थिति 20 डिग्री दक्षिणी अक्षांश से 5 डिग्री उत्तरी अक्षांश के मध्य हो गया।

3.8 करोड़ वर्ष पूर्व इसकी स्थिति लगभग 5 डिग्री दक्षिणी अक्षांश से 20 डिग्री उत्तरी अक्षांश के मध्य हो गया। इस समय यह प्लेट यूरेशियाई प्लेट के सम्पर्क में आया। लगभग 1 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप का सम्पूर्ण हिस्सा विषुवत रेखा को पार करके उत्तरी गोलार्द्ध में पहुंच गया और वर्त्तमान समय में यह उत्तर-पूर्व की ओर अग्रसारित है।

 

 

 

 प्रवाहित भारतीय प्लेट के परिणाम

 

  • इसके उत्तर में यूरेशियाई प्लेट के साथ अभिसारी प्लेट सीमा पर विश्व के सबसे ऊँची पर्वत शृंखला हिमालय का निर्माण हुआ है।
  • टेथिस सागर का विनास इस प्लेट के उत्तर-पूर्व में अभिसरण के कारण ही हुआ है। जहाँ पर हिमालय तथा भारत के उत्तरी विशाल मैदान का निर्माण हुआ है।
  • इसके यूरेशियाई प्लेट के टकराने से ही भारत में विंध्याचल पर्वत, सतपुड़ा की श्रेणियों एवं भ्रंश नर्मदा घाटी का विकास हुआ है।
  • हिन्द महासागर तथा अंटार्कटिक महासागर के मध्य और अधिक क्षेत्र का विस्तार
  • इंडो-आस्ट्रेलियन प्लेट के उत्तर-पूर्व की ओर प्रवाहित होने के कारण ही आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर ग्रेट डिवाइडिंग रेंज का भी निर्माण हुआ है।
  • अंटर्कटिक प्लेट तथा इंडो-आस्ट्रेलियन प्लेट के अपसारी प्लेट सीमा पर कटको का विकास इसी कारण से हुआ है।

 

 

 

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