अध्याय : 2 आँकडो का संग्रह

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अध्याय : 2 आँकडो का संग्रह

☆ इस अध्याय को पढ़ने के बाद आप निम्नलिखित जानकारी से परिचित होंगे|

●आँकडा – संग्रह का अर्थ और उद्देश्य समझ सके;
● आँकडा संग्रह की विधि समझ सके;
● प्राथमिक एवं द्वितीयक स्रोतों के बीच अंतर कर सके;
● जनगणना एवं प्रतिदर्श सर्वेक्षण के बीच अंतर कर सके;
● प्रतिचयन की प्रविधि से परिचित हो सके;
● द्वितीयक आंकड़ों के कुछ महत्वपूर्ण स्रोतों के बारे में जा सके|

 

☆ प्रस्तावना:- पिछले अध्याय में आपको अर्थशास्त्र की विषयवस्तु और अर्थशास्त्र में सांख्यिकी की भूमिका एवं महत्व के बारे में जानकारी मिली|

● इस अध्याय में आप आँकडो के स्रोतों एवं आँकडा – संग्रह की विधि के बारे में अध्ययन करके जानकारी प्राप्त करेंगे|

☆ आँकडो के संग्रह का उद्देश्य किसी समस्या के स्पष्ट एवं ठोस समाधान के लिए साक्ष्य को दर्शाना है|
☆ अर्थशास्त्र में प्राय: ऐसे कथनों से आपका सामना होता है जैसे:-
● ” खाद्यान्नों का उत्पादन 1970 – 71 में 10.8 करोड़ टन से बढ़कर 1978-79 में 13.2 करोड़ टन हो गया|
● 1979-80 में फिर से गिर कर 10.8 करोड़ टन हो गया|
● उसके पश्चात खाद्यान्नों का उत्पादन 2015-16 तक लगातार बढ़ कर 25.2 करोड़ टन हो गया|
● 2016-17 में इसने 27.2 करोड़ टन का आँकडा छू लिया”

● बीजगणित में राशियों की जगह विभिन्न खाद्यान्नों का उत्पादन एक समान नहीं रहा है| जिनका मूल्य अलग स्थान पर अलग होता है जैसे फसल-दर-फसल तथा वर्ष-दर-वर्ष बदलता रहता हैंl ऐसे ही मूल्य में परिवर्तन शील होता है अतः इन्हें ही चर कहते हैंl
● इन चरों को प्राय:X,Y,Z आदि अक्षरों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है|

◇ हर एक चर का मूल्य प्रेक्षण कहलाता है |
उदाहरण:- भारत में खाद्यान्न उत्पादन 1970-71 में 108 मिलियन टन से लेकर वर्ष 2016-17 में 272 मिलियन टन के बीच रहा |
इसे हम सारणी के माध्यम से समझ सकते हैं |

भारत मे खाद्यान्नों का उत्पादन ( मिलियन टन में )
X. Y
1970-71 108
1978-79 132
1990-91 176
1997-98 194
2001-02 212
2015-16 252
2016-17 272

इन आँकडो के माध्यम से हम भारत के खाद्यान्नों के उत्पादन के बारे में जानकारी ले सकते हैं |
☆ आँकडा एक ऐसा साधन है, जो सूचनाएँ प्रदान कर समस्या को समझने में सहायता करता है |

 

 

 ☆ आँकड़ों के स्रोत क्या है

◆ आँकड़ों के दो स्रोत है:-
▪︎ प्राथमिक आँकड़े
▪︎ द्वितीयक आँकड़े

◆ प्राथमिक आँकड़े:- वे आँकड़े जिन्हें सर्वेक्षण कर्ता खुद जांच-पड़ताल, पूछताछ कर आँकड़े एकत्रित करता है | ऐ आँकड़े प्रत्यक्ष रूप से एकत्र की गई जानकारी पर आधारित है |

आइए हम अब उदाहरण से समझते हैं :- एक व्यक्ति जो विद्यालय की जानकारी लेने खुद विद्यालय जाकर वहां के छात्रों से पूछताछ कर जानकारी प्राप्त करती है |

◆ द्वितीयक आँकड़े:- वे आँकड़े जो किसी दूसरे संस्था द्वारा संग्रहित या एकत्रित किया जाता हैं, तो उसे द्वितीयक आँकड़े कहते हैं |
● इन आँकडो को संग्रहित प्रकाशित स्रोतो से जैसे सरकारी रिपोर्ट, दस्तावेज, समाचार पत्र, अर्थशास्त्रियों द्वारा लिखित पुस्तक या किसी अन्य स्रोतों से प्राप्त किया जा सकता है |

● ऐ आँकडे उन लोगों के लिए प्राथमिक है, जो उन्हें पहली बार संग्रहित करते हैं और उसके बाद करने वाले आँकड़े द्वितीयक ही होते हैंl
● द्वितीयक आँकडो से समय और धन की बचत होती है |

● अगर कोई किसी चीज की जानकारी लेना चाहता है, तो वह रिपोर्ट या समाचार पत्र के द्वारा ले सकते हैंl
● जब कोई विनिर्मित अपने किसी उत्पाद के संबंध में या कोई राजनैतिक पार्टी अपने किसी उम्मीदवार के विषय में कैसे निर्णय लेता है| वह इसके विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए जन-समुदाय से प्रश्नों के माध्यम से सर्वेक्षण करता है|
● इस सर्वेक्षण का उद्देश्य कुछ विशिष्टताओ जैसे:- गुणवत्ता, कीमत, लोकप्रियता, और उपयोगिता, ईमानदारी और निष्ठा के विषय में जानकारी प्राप्त करना होता हैंl

 

 

● सर्वेक्षण में ही आँकड़ों को भी संग्रहित किया जाता हैंl

◆ सर्वेक्षण वह विधि है जिसके द्वारा विभिन्न व्यक्तियों से सूचना एकत्र की जाती है|
★ सर्वेक्षण की साधनों की तैयारी
● सर्वेक्षणों में उपयोग किए जाने वाला सर्वाधिक प्रचलित साधन प्रश्नावली अनुसूची है |
● प्रश्नावली अनुसूची को तैयार करने में हमलोगों को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए |
★साक्षात्कार:- साक्षात्कार से यह तात्पर्य है कि एक संरचित वार्तालाप जहां एक प्रतिभागी प्रश्न पूछता और दूसरा उत्तर देता |
● कोशिश करें की प्रश्नावली ज्यादा लंबी ना हो, प्रश्नों की संख्या कम से कम होनी चाहिए| लंबी प्रश्नावली उत्तरदाताओं को निराश कर देती है|
● प्रश्नावली ऐसे शब्दों से तैयार होना चाहिए ताकि समझने में आसानी हो|
● प्रश्न ऐसे क्रम में व्यवस्थित किए जाने चाहिए कि उत्तर देने वाला व्यक्ति आराम से उत्तर दे सके|
● प्रश्नावली सामान्य प्रश्नों से आरंभ होकर विशिष्ट प्रश्नों की ओर बढ़नी चाहिए|

उदाहरण:- गलत प्रश्न
1. क्या आप इस उच्च कोटि की चाय को पसंद करते हैं?
2. सही प्रश्न

 

आपको इस चाय का स्वाद कैसा लगा?
★संरचित प्रश्न:-संरचित का मतलब है कि जिसे संचार हुआ हो|
● संरचित प्रश्न याअसंरचित प्रश्न या तो द्वीविध प्रश्न हो सकते हैं या फिर बहुविकल्पी प्रश्न हो सकते हैंl
★ जब किसी प्रश्न के उत्तर में ‘हां’ या ‘नहीं’ के मात्र दो ही विकल्प होते हैं तो इसे द्वीविध प्रश्न कहते हैं
★ बहुविकल्पी प्रश्न:- जब प्रश्नावली के अंतर्गत दो से अधिक उत्तरों के विकल्प होते हैं, तो वहां बहुविकल्पी प्रश्न उपयुक्त होते हैं|
★वैयक्तिक साक्षात्कार:-
●वैयक्तिक साक्षात्कार को अनेक कारणों से प्राथमिकता दी जाती हैंl
● इसमें सर्वेक्षक एवं उत्तरदाता के बीच व्यक्तिगत संपर्क होता हैंl
★वैयक्तिक साक्षात्कार की कुछ कमियां निम्नलिखित है:-
● यह काफी खर्चीली होती है
● इसमें प्रशिक्षित साक्षात्कार कर्ताओं की जरूरत होती हैंl
● इसमें सर्वेक्षण पूरा करने में काफी ज्यादा समय लगता है|
● कभी-कभी शोधकर्ता की उपस्थिति के कारण उत्तरदाता सही बात नहीं बताते हैंl

 

 

★ टेलीफोन साक्षात्कार:-
● टेलीफोन साक्षात्कार के अंतर्गत शोधकर्ता/ जाँचकर्ता टेलीफोन के माध्यम से सर्वेक्षण करता हैंl
● टेलीफोन साक्षात्कार के कुछ लाभ निम्नलिखित है:-
1. यह वैयक्तिक साक्षात्कार की अपेक्षा सस्ता होता हैंl
2. इसे कम समय में ही संपन्न किया जा सकता हैंl
3. यह प्रश्नों को स्पष्ट करके सर्वेक्षक या शोधकर्ता के लिए उत्तरदाता की मदद करने में सहायक होता हैंl
● टेलीफोन साक्षात्कार उस समय अधिक बेहतर होता है, जब वैयक्तिक साक्षात्कार के समय उत्तरदाता कुछ खास प्रश्न के उत्तर देने में घबराहट महसूस करते हैंl
★ इस विधि की कुछ कमियाँ निम्नलिखित है:-
1. इसमें लोगों तक सर्वेक्षक की पहुंच सीमित हो जाती है, क्योंकि बहुत सारे लोगों के पास अपना खुद का टेलीफोन नहीं भी हो सकते हैंl
2. संवेदनशील मुद्दों पर उत्तरदाताओं की उन प्रतिक्रियाओं को दृश्य रूप में नहीं देखा जा सकता है, जो इन विषयों पर सही जानकारी प्राप्त करने में सहायक होती हैंl

 

 

★ प्रायोगिक सर्वेक्षण:-
● एक बार जब सर्वेक्षण हेतु प्रश्नावली तैयार हो जाए तो यह सलाह दी जाती है कि एक छोटा समूह का सर्वेक्षण करके देख लिया जाना चाहिए|
◇ जिसे प्रायोगिक सर्वेक्षण के रूप में या प्रश्नावली की पूर्व परीक्षा के रूप में जाना जाता है|
★प्रायोगिक सर्वेक्षण निम्न प्रकार से सहायक है:-
1. सर्वेक्षण के बारे में प्रारंभिक अनुमान लगाने में,
2. प्रश्नावली के पूर्व- परीक्षण में,
3. प्रश्नों की उपयुक्तता में,
4. प्रश्नों की निर्देशों की स्पष्टत में,
5. प्रश्नों की सर्वेक्षक की कार्य दक्षता में,
6. वास्तविक सर्वेक्षण में आनेवाली लागत एवं समय का अनुमान लगाने में,
● ताकि प्रश्नों की कमियों एवं त्रुटियो को पता किया जा सके|
★ जनगणना तथा प्रतिदर्श सर्वेक्षण जनगणना या पूर्ण गणना
● जनगणना या पूर्ण गणना का मतलब यह है कि, वह सर्वेक्षण, जिसके अंतर्गत जनसंख्या के सभी तत्व शामिल होते हैं, उसे जनगणना या पूर्ण गणना की विधि कहा जाता हैंl
● इस विधि की प्रमुख विशेषता है कि इसके अंतर्गत संपूर्ण जनसंख्या की प्रत्येक व्यष्टिगत इकाई को सम्मिलित करना होता हैंl
★ भारत की जनगणना हर 10 साल में एक बार होती है|
● इसके अंतर्गत जन्म एवं मृत्युदर, साक्षरता, रोजगार, आयु संभाविता, या प्रत्याशित आयु, जनसंख्या के आकार एवं संरचना आदि के जनसंख्या आंकड़े जुटाए जाते हैंl
● जिन्हें भारत के महानिदेशक द्वारा संगृहीत एवं प्रकाशित किया जाता है|
● भारत में पिछली जनगणना 2011 में की गई थी|
● 2001 के जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 102.87 थी |
● 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 121.09 करोड़ है|
● 1901 की जनगणना ने देश की जनसंख्या 23.83 करोड़ दर्शाई थी|
● उस समय से 110 वर्षों की समयावधि में, देश की जनसंख्या 97 करोड़ से भी अधिक बढ़ गई है|
● जनसंख्या की औसत वार्षिक वृद्धि दर, जो 1971-81 में 2.2 प्रतिशत प्रतिवर्ष थी|
●1991-2001 में घटकर 1.97 प्रतिशत हो गई|
●2001-2011 में 1.64 हो गई|
★जनसंख्या तथा प्रतिदर्श
● सांख्यिकी मे ‘समष्टि’ शब्द का तात्पर्य है अध्ययन-क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली सभी मदों/इकाइयों की समग्रता|
● समष्टि:- एक ऐसा समूह है, जिस पर किसी अध्ययन के परिणाम लागू हो सके|
● सर्वेक्षण के उद्देश्य के अनुसार किसी समष्टि के अंतर्गत सदैव ऐसी सभी व्यष्टि तथा इकाइयां/ मदे आती है, जिनमें कुछ विशेषताएं हो|

 

◇ प्रतिदर्श चुनने में पहला कार्य समष्टि की पहचान करना होता हैंl
● एक आदर्श प्रतिदर्श सामान्यता: समष्टि से छोटा होता है तथा अपेक्षाकृत कम लागत एवं कम समय में समष्टि के बारे में पर्याप्त सही सूचनाएँ प्रदान करने में सक्षम होता हैंl
● अधिकतर सर्वेक्षण प्रतिदर्श सर्वेक्षण ही होते हैं सांख्यिकी में इन्हें कई कारणों से प्राथमिकता दी जाती है ये प्रतिदर्श कम से कम खर्चे में थोड़े ही समय में अधिक पर्याप्त विश्वसनीय एवं सही सूचनाओं जमा करते हैंl
● प्रतिदर्श सर्वेक्षण समष्टि से छोटा होता है तथा सघन पूछताछ के बाद अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैंl
[3:18 pm, 04/10/2023] Muskan Laxmi: ★ प्रतिदर्श का चुनाव कैसे करें:-
तो इसके लिए इसके दो तरीके हैं:-
i)यादृच्छिक
ii) अयादृच्छिक

 

★यादृच्छिक:-यादृच्छिक प्रतिचयन वह होता है, जहां समष्टि प्रतिदर्श समूह से व्यष्टिगत इकाइयों को यादृच्छिक रूप से चुना जाता हैंl
★अयादृच्छिक:- अयादृच्छिक प्रतिचयन वह होता है, जिसमें आपको 20 परिवारो में से 10 को चुनना होता है, इसमें आपको तय करना है कि आप कौन-कौन से परिवार को चुनेंगे|
★ प्रतिचयन एवं अप्रतिचयन त्रुटियाँ
★ प्रतिचयन त्रुटियाँ:-
◇ संख्यात्मक मानो वाली जनसंख्या की दो महत्वपूर्ण विशेषताएं होती है जो निम्नलिखित ह:-
1. केंद्रीय प्रवृत्ति, जिसका मापन औसत, माध्य या बहुलक के द्वारा किया जा सकता हैंl
2. विचलन, जिसका मापन ‘मानक विचलन’, ‘माध्य विचलन’ परास आदि की गणना द्वारा किया जा सकता हैंl
● प्रतिदर्श का उद्देश्य जनसंख्या प्राचलो के एक या अधिक आकलनो को प्राप्त करना होता हैंl
★ अप्रतिचयन त्रुटियाँ:-
●अप्रतिचयन त्रुटियाँ प्रतिचयन त्रुटियो की अपेक्षा अधिक गंभीर होता है|
● ऐसा इसलिए होता है कि प्रतिचयन त्रुटियो को बड़े आकार के प्रतिदर्श लेकर कम किया जा सकता है, पर अयादृच्छिक त्रुटियों को कम करना असंभव है, चाहे प्रतिदर्श का आकार बड़ा ही क्यों ना रखा जाए|
● जनगणना में भी अयादृच्छिक त्रुटि की संभावना हो सकती है |
★अयादृच्छिक त्रुटियों के कुछ उदाहरण निम्नलिखित है:
1. आँकड़ा अर्जन में त्रुटियाँ:
● इस प्रकार के त्रुटियाँ गलत उत्तरों को रिकार्ड करने से पैदा होती हैंl
● मान ले कि एक शिक्षक कक्षा के छात्रों से अध्यापक की मेज की लंबाई को मापने के लिए कहता हैंl छात्रों द्वारा लिए गए माप में अंतर हो सकते हैंl ये अंतर फीते में अंतर, छात्रों की लापरवाही, आदि के कारण हो सकते हैंl

 

 

★ अनुत्तर संबंधी त्रुटियाँ:-
●अनुत्तर संबंधी त्रुटियों की संभावना तब होती है, जब साक्षात्कारकर्ता प्रतिदर्श सूची में सूचीबद्ध उत्तरदाता से संपर्क नहीं स्थापित कर पाता है या प्रतिदर्श सूची का कोई व्यक्ति उत्तर देने से मना कर देता हैंl ऐसे मामलों में प्रतिदर्श प्रेक्षण को प्रतिनिधि प्रतिदर्श नहीं माना जा सकता हैंl
★ प्रतिदर्श अभिनति:-प्रतिदर्श अभिनति की संभावना तब होती है जब प्रतिचयन योजना ऐसी हो कि उसके अंतर्गत समष्टि से कुछ ऐसे सदस्यों के सम्मिलित होने की संभावना नहीं है, जिन्हें प्रतिदर्श में शामिल किया जाना चाहिए था|
★भारत की जनगणना तथा राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण(NSS)
● राष्ट्रीय एवं राज्य दोनों ही स्तरों पर ऐसी संस्थाएँ होती है, जो सांख्यिकीय आँकड़ों को संगृहीत संसाधित तथा सारणीकृत करती हैंl
★ इनमें से राष्ट्रीय स्तर की कुछ प्रमुख संस्थाएँ निम्नलिखित है:-
1. सेन्सस ऑफ़ इंडिया
2. राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण(NSS)
3. केंद्रीय सांख्यिकीय कार्यालय (CSO)
4. भारत का महापंजीकर (RGI)
5. वाणिज्यिक सतर्कता एवं सांख्यिकी महानिदेशालय ( DGCIS)
6. श्रम ब्यूरो आदि |
● वर्ष 1881 के बाद से प्रत्येक 10 वर्ष के अंतराल पर नियमित जनगणना की
जाती है|
● देश की आजादी के बाद पहली जनगणना वर्ष 1951 हुई थी|
★ इन जनगणनाओ के अंतर्गत जनसंख्या के विभिन्न पहलुओं के बारे में सूचनाएँ एकत्र की जाती है, जैसे:
● आकार,घनत्व, लिंग-अनुपात, साक्षरता, स्थानांतरण, तथा जनसंख्या का ग्रामीण-शहरी वितरण आदि|

 

 

 

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