अध्याय 3 : पृथ्वी की आंतरिक संरचना

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पृथ्वी के धरातल का विन्यास मुख्यतः भूगर्भ में होने वाली प्रक्रियाओं का परिणाम है। बहिर्जात व अंतर्जात प्रक्रियाएँ लगातार भूदृश्य को आकार देती रहती हैं।भू-पर्पटी (Crust) से क्रोड (Core) तक सभी पदार्थ परतों के रूप में विभाजित हैं।

 

 

 भूगर्भ की जानकारी के साधन

पृथ्वी की त्रिज्या 6.370 कि0मी0 है। पृथ्वी की आंतरिक परिस्थितियों के कारण यह संभव नहीं है कि कोई पृथ्वी के केंद्र तक पहुँचकर उसका निरीक्षण कर सके या वहाँ के पदार्थ का कुछ नमूना प्राप्त कर सके।

 

पृथ्वी की आंतरिक संरचना के विषय में हमारी अधिकतर जानकारी परोक्ष रूप से प्राप्त अनुमानों पर आधारित है। तथापि इस जानकारी का कुछ भाग प्रत्यक्ष प्रेक्षणों और पदार्थ के विश्लेषण पर भी आधारित है।

 

 

 प्रत्यक्ष स्त्रोत

 

पृथ्वी से सबसे आसानी से उपलब्ध ठोस पदार्थ धरातलीय चट्टानें हैं, अथवा वे चट्टानें है, जो हम खनन क्षेत्रों से प्राप्त करते हैं। दक्षिणी अफ्रीका की सोने की खानें 3 से 4 कि0मी0 तक गहरी हैं। इससे अधिक गहराई में जा पाना असंभव है,

 

वैज्ञानिक दो मुख्य परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं। ये हैं गहरे समुद्र में प्रवेधन परियोजना व समन्वित महासागरीय प्रवेधन परियोजना

सबसे गहरा प्रवेधन (Drill) : आर्कटिक महासागर में कोला (Kola) क्षेत्र में 12 किमी) की गहराई तक किया गया है। इन परियोजनाओं तथा बहुत सी अन्य गहरी खुदाई परियोजनाओं के अंतर्गत विभिन्न गहराई से प्राप्त पदार्थों के विश्लेषण से हमें पृथ्वी की आंतरिक संरचना से संबंधित असाधारण जानकारी प्राप्त हुई है।

 

ज्वालामुखी :  उद्गार प्रत्यक्ष जानकारी का एक अन्य स्रोत है। जब कभी भी ज्वालामुखी उद्गार से लावा पृथ्वी के धरातल पर आता है, यह प्रयोगशाला अन्वेषण के लिए उपलब्ध होता है।

 

 

 

अप्रत्यक्ष स्त्रोत

 

पदार्थ के गुणधर्म के विश्लेषण : से पृथ्वी के आंतरिक भाग की अप्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त होती है। खनन क्रिया से हमें पता चलता है कि पृथ्वी के धरातल में गहराई बढ़ने के साथ-साथ तापमान एवं दबाव में वृद्धि होती है। इतना ही नहीं, हमें यह भी पता चलता है कि गहराई बढ़ने के साथ-साथ पदार्थ का घनत्व भी बढ़ता है। तापमान, दबाव व घनत्व में इस परिवर्तन की दर को आँका जा सकता है।

 

 

दूसरा अप्रत्यक्ष स्रोत उल्काएँ हैं, : जो कभी-कभी धरती तक पहुँचती हैं। हाँलाकि, हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उल्काओं के विश्लेषण के लिए उपलब्ध पदार्थ पृथ्वी के आंतरिक भाग से प्राप्त नहीं होते हैं। पृथ्वी की आंतरिक जानकारी के लिए उल्काओं का अध्ययन एक अन्य महत्वपूर्ण स्रोत है।

 

अप्रत्यक्ष स्रोतों में गुरुत्वाकर्षण, चुंबकीय क्षेत्र,  भूकंप संबंधी क्रियाएँ शामिल हैं। पृथ्वी के धरातल पर भी विभिन्न अक्षांशों पर गुरुत्वाकर्षण बल एक समान नहीं होता है। पृथ्वी के केंद्र से दूरी के कारण गुरुत्वाकर्षण बल ध्रुवों पर अधिक और भूमध्यरेखा पर कम होता है। गुरुत्व का मान पदार्थ के द्रव्यमान के अनुसार भी बदलता है।

 

 

 गुरुत्व विसंगति :

पृथ्वी के भीतर पदार्थों का असमान वितरण भी इस भिन्नता को प्रभावित करता है। अलग-अलग स्थानों पर गुरुत्वाकर्षण की भिन्नता अनेक अन्य कारकों से भी प्रभावित होती है। इस भिन्नता को गुरुत्व विसंगति (Gravity anomaly ) कहा जाता है।

 

 

 

भूकंप :-

 

भूकंपीय तरंगों का अध्ययन, पृथ्वी की आंतरिक परतों का संपूर्ण चित्र प्रस्तुत करता है। पृथ्वी का कंपन। यह एक प्राकृतिक घटना है। ऊर्जा के निकलने के कारण तरंगे उत्पन्न होती हैं, जो सभी दिशाओं में फैलकर भूकंप लाती हैं।

 

 

पृथ्वी में कंपन क्यों होता है?

प्रायः भ्रंश के किनारे-किनारे ही ऊर्जा निकलती है।भूपर्पटी को शैलों में गहन दरारें ही भ्रंश होती हैं। भ्रंश के दोनों तरफ शैले विपरीत दिशा में गति करती हैं। जहाँ ऊपर के शैलखंड दबाव डालते हैं, उनके आपस का घर्षण उन्हें परस्पर बाँधे रहता है। फिर भी अलग होने की प्रवृत्ति के कारण एक समय पर घर्षण का प्रभाव कम हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप शैलखंड विकृत होकर अचानक एक दूसरे के विपरीत दिशा में सरक जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप ऊर्जा निकलती है और ऊर्जा तरंगें सभी दिशाओं में गतिमान होती हैं।

 

 

भूकंप का उद्गम केन्द्र :- वह स्थान जहाँ से ऊर्जा निकलती है. भूकंप का उद्गम केन्द्र (Focus ) कहलाता है । इसे अवकेंद्र (Hypocentre) भी कहा जाता है।

 

अधिकेंद्र :- ऊर्जा तरंगें अलग-अलग दिशाओं में चलती हुई पृथ्वी की सतह तक पहुँचती हैं। भूतल पर वह बिंदु जो उद्गम केंद्र के समीपतम होता है, अधिकेंद्र (Epicentre) कहलाता है। अधिकेंद्र पर ही सबसे पहले तरंगों को महसूस किया जाता है। अधिकेंद्र उद्गम केंद्र के ठीक ऊपर (90 के कोण पर) होता है

 

 

 भूकंपीय तरंगें :-

सभी प्राकृतिक भूकंप स्थलमंडल (Lithosphere) में ही आते हैं।

स्थलमंडल पृथ्वी के धरातल से 200 कि०मी०) तक की गहराई वाले भाग को कहते हैं। भूकंपमापी यंत्र सतह पर पहुँचने वाली भूकंपतरंगों को अभिलेखित करता हैं।

 

 

भूकंपीय तरंगें दो प्रकार की हैं :-

 

1) भूगर्भिक तरंगे :- भूगर्भिक तरंगें उद्गम केंद्र से ऊर्जा के मुक्त होने के दौरान पैदा होती हैं और पृथ्वी के अंदरूनी भाग से होकर सभी दिशाओं में आगे बढ़ती हैं। इसलिए इन्हें गति के समकोण भूगर्भिक तरंगें कहा जाता है।

 

2) धरातलीय तरंगें :- भूगर्भिक तरंगों एवं धरातलीय शैलों के मध्य अन्योन्य क्रिया के कारण नई तरंगे उत्पन्न होती हैं जिन्हें धरातलीय तरंगें कहा जाता है।

 

 ये तरंगे धरातल के साथ-साथ चलती है। तरंगों का वेग अलग-अलग घनत्व वाले पदार्थों से गुजरने पर परिवर्तित हो जाता है। अधिक घनत्व वाले पदार्थों में तरंगों का वेग अधिक होता है।

 

 

 

भूगर्भीय तरंगें भी दो प्रकार की होती हैं :-

 

इन्हें ‘P’ तरंगें व ‘S’ तरंगें कहा जाता है।

 

प्राथमिक तरंगे :- ‘P’ तरंगें तीव्र गति से चलने वाली तरंगें हैं और धरातल पर सबसे पहले पहुँचती हैं। इन्हें ‘प्राथमिक तरंगे’ भी कहा जाता है। ‘P’ तरंगें ध्वनि तरंगों जैसी होती हैं। ये गैस, तरल व ठोस – तीनों प्रकार के पदार्थों से गुजर सकती हैं।

 

द्वितीयक ‘तरंगें’ :- ‘S’ तरंगें धरातल पर कुछ समय अंतराल के बाद पहुँचती हैं। ये ‘द्वितीयक ‘तरंगें’ कहलाती हैं। ‘S’ तरंगों के विषय में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ये केवल ठोस पदार्थों के ही माध्यम से चलती हैं। ‘S’ तरंगों की यह एक महत्वपूर्ण विशेषता है।

 

 

 भूकंपीय तरंगों का संचरण

‘P’ तरंगों से कंपन की दिशा तरंगों की दिशा के समानांतर ही होती है। यह संचरण गति की दिशा में ही पदार्थ पर दबाव डालती है। इसके (दबाव) के फलस्वरूप पदार्थ के घनत्व में भिन्नता आती है और शैलों में संकुचन व फैलाव की प्रक्रिया पैदा होती है।

‘S’ तरंगे ऊर्ध्वाधर तल में, तरंगों की दिशा के समकोण पर कंपन पैदा करती हैं। अतः ये जिस पदार्थ से गुजरती हैं उसमें उभार व गर्त बनाती हैं। धरातलीय तरंगें सबसे अधिक विनाशकारी समझी जाती हैं।

 

 

 भूकंप के प्रकार :

 

1) सामान्यतः विवर्तनिक (Tectonic) भूकंप ही अधिक आते हैं। ये भूकंप भ्रंशतल के किनारे चट्टानों के सरक जाने के कारण उत्पन्न होते हैं।

 

(ii) एक विशिष्ट वर्ग के विवर्तनिक भूकंप को ही ज्वालामुखीजन्य (Volcanic) भूकंप समझा जाता है। ये भूकंप अधिकांशतः सक्रिय ज्वालामुखी क्षेत्रों तक ही सीमित रहते हैं।

 

(iii) खनन क्षेत्रों में कभी-कभी अत्यधिक खनन कार्य से भूमिगत खानों की छत ढह जाती है, जिससे हल्के झटके महसूस किए जाते हैं। इन्हें नियात (Collapse) भूकंप कहा जाता है।

 

(iv) कभी-कभी परमाणु व रासायनिक विस्फोट से भी भूमि में कंपन होती है। इस तरह के झटकों को विस्फोट (Explosion) भूकंप कहते हैं।

 

(v) जो भूकंप बड़े बाँध वाले क्षेत्रों में आते हैं, उन्हें बाँध जनित (Reservoir induced ) भूकंप कहा जाता है।

 

 

 रिक्टर स्केल :-

भूकंपीय घटनाओं का मापन भूकंपीय तीव्रता के आधार पर अथवा आघात की तीव्रता के आधार पर किया जाता है भूकंपीय तीव्रता की मापनी ‘रिक्टर स्केल’ (Richter scale) के नाम से जानी जाती है मापनी के अनुसार भूकंप की तीव्रता 0 से 10 तक होती

 

 

 भूकंप के प्रभाव

 

(i) भूमि का हिलना

(ii) धरातलीय विसंगति

(iii) भू-स्खलन / पंकस्खलन

(iv) मृदा द्रवण (Soil liquefaction)

v) धरातल का एक तरफ झुकना

(vi) हिमस्खलन

(vii) धरातलीय विस्थापन

(viii) बाँघ व तटबंध के टूटने से बाढ़

ix) आग लगना

(x) इमारतों का टूटना तथा ढाँचों का ध्वस्त होना

(xi) वस्तुओं का गिरना

(xii) सुनामी।

 

 

भूकंप की आवृत्ति

 

भूकंप एक प्राकृतिक आपदा है। तीव्र भूकंप के झटकों से जन व धन की अधिक हानि होती है। यह देखा गया है कि रिक्टर स्केल पर 8 से अधिक तीव्रता वाले भूकंप के आने की संभावना बहुत ही कम होती है जो 1-2 वर्षों में एक ही बार आते हैं। जबकि हल्के भूकंप लगभग हर मिनट पृथ्वी के किसी न किसी भाग में महसूस किए जाते हैं।

 

 

 

 

 पृथ्वी की संरचना

 

भूपर्पटी (The Crust)

यह ठोस पृथ्वी का सबसे बाहरी भाग है। यह बहुत भंगुर (Brittle) भाग है जिसमें जल्दी टूट जाने की प्रवृत्ति पाई जाती है। भूपर्पटी की मोटाई महाद्वीपों व महासागरों के नीचे अलग-अलग है। महासागरों में भूपर्पटी की मोटाई महाद्वीपों की तुलना में कम है।

महासागरों के नीचे इसकी औसत मोटाई 5 कि0 मी0 है, जबकि महाद्वीपों के नीचे यह 30 कि0 मी0 तक है। मुख्य पर्वतीय श्रृंखलाओं के क्षेत्र में यह मोटाई और भी अधिक है। हिमालय पर्वत श्रेणियों के नीचे भूपर्पटी की मोटाई लगभग 70 कि०मी० तक है।

 

 

मैंटल (The Mantle)

भूगर्भ में पर्पटी के नीचे का भाग मैंटल कहलाता है। यह मोहो असांतत्य (Discontinuity) से आरंभ होकर 2.900 कि0 मी0 की गहराई तक पाया जाता है। मैंटल का ऊपरी भाग दुर्बलतामंडल (Asthenosphere) कहा जाता है। ‘एस्थेनो’ (Astheno) शब्द का अर्थ दुर्बलता से है। इसका विस्तार 400 कि0मी0 तक आँका गया है। ज्वालामुखी उद्गार के दौरान जो लावा धरातल पर पहुँचता है, उसका मुख्य स्रोत यही है। भूपर्पटी एवं मैंटल का ऊपरी भाग मिलकर स्थलमंडल (Lithosphere) कहलाते हैं। इसकी मोटाई 10 से 200 कि0 मी0 के बीच पाई जाती है। निचले मैंटल का विस्तार दुर्बलतामंडल के समाप्त हो जाने के बाद तक है। यह ठोस अवस्था में है।

 

 

क्रोड (The Core)

भूकंपीय तरंगों के वेग ने पृथ्वी के क्रोड को समझने में सहायता की है। क्रोड व मैंटल की सीमा 2.900 कि०मी० की गहराई पर है। बाह्य क्रोड (Outer core) तरल अवस्था में है जबकि आंतरिक क्रोड (Inner core ) ठोस अवस्था में है। क्रोड भारी पदार्थों मुख्यतः निकिल (Nickle) व लोहे (Ferrum) का बना है। इसे ‘निफे’ (Nife) परत के नाम से भी जाना जाता है।

 

 

 

 

ज्वालामुखी ;-

 

ज्वालामुखी वह स्थान है जहाँ से निकलकर गैसें, राख और तरल चट्टानी पदार्थ, लावा पृथ्वी के धरातल तक पहुँचता है। यदि यह पदार्थ कुछ समय पहले ही बाहर आया हो या अभी निकल रहा हो तो वह ज्वालामुखी सक्रिय ज्वालामुखी कहलाता है।

 

 

मैग्मा :- तरल चट्टानी पदार्थ दुर्बलता मण्डल से निकल कर धरातल पर पहुँचता है। जब तक यह पदार्थ मैटल के ऊपरी भाग में है, यह मैग्मा कहलाता है।

 

 

 मुख्य ज्वालामुखी निम्न प्रकार से हैं

 

शील्ड ज्वालामुखी

सभी ज्वालामुखियों में शील्ड ज्वालामुखी सबसे विशाल है। हवाई द्वीप के ज्वालामुखी इसके सबसे अच्छे इन ज्वालामुखियों उदाहरण हैं।

ये ज्वालामुखी मुख्यतः बेसाल्ट से निर्मित श्यान (गाढ़ा या होते हैं जो तरल लावा के ठंडे होने से बनते हैं। यह ज्वालामुखी भीषण लावा उद्गार के समय बहुत तरल होता है। इसी कारण भारी मात्रा में इन ज्वालामुखियों का ढाल तीव्र नहीं होता।

यदि किसी तरह निकास नालिका (Vent) से पानी भीतर चला जाए तो ये ज्वालामुखी विस्फोटक भी हो जाते हैं। अन्यथा कम विस्फोटक होना ही इनकी विशेषता है। इन ज्वालामुखियों से लावा फव्वारे के रूप में बाहर आता है और निकास पर एक शंकु ( Cone) बनाता है, जो सिंडर शंकु (Cindar Cone) के रूप में विकसित होता है।

 

 

 मिश्रित ज्वालामुखी

इन ज्वालामुखियों से बेसाल्ट की अपेक्षा अधिक ठंडे व श्यान (गाढ़ा या चिपचिपा ) लावा उद्गार होते हैं। प्राय: ये ज्वालामुखी भीषण विस्फोटक होते हैं। इनसे लावा के साथ भारी मात्रा में ज्वलखण्डाश्मि (Pyroclastic) पदार्थ व राख भी धरातल पर पहुँचती हैं।

 

 

ज्वालामुखी कुंड

ये पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे अधिक विस्फोटक ज्वालामुखी हैं। इतने विस्फोटक होते हैं कि जब इनमें विस्फोट होता है तब वे ऊँचा ढाँचा बनाने के बजाय स्वयं नीचे धँस जाते हैं। धँसे हुए विध्वंस गर्त (लावा के गिरने से जो गड्ढे बनते हैं) ही ज्वालामुखी कुंड (Caldera) कहलाते हैं।

 

 

बेसाल्ट प्रवाह क्षेत्र

ये ज्वालामुखी अत्यधिक तरल लावा उगलते हैं जो बहुत दूर तक बह निकलता है। कई बार अकेला प्रवाह सैकड़ों कि0मी0 दूर तक फैल जाता है। भारत का दक्कन ट्रैप, जिस पर वर्तमान महाराष्ट्र पठार का ज्यादातर भाग पाया जाता है, वृहत् बेसाल्ट लावा प्रवाह क्षेत्र है।

 

 

 मध्य- महासागरीय कटक ज्वालामुखी

इन ज्वालामुखियों का उद्गार महासागरों में होता है। मध्य महासागरीय कटक एक श्रृंखला है जो 70.000 कि0मी0 से अधिक लंबी है और जो सभी महासागरीय बेसिनों में फैली है।

 

 

 

 ज्वालामुखी स्थलाकृतियाँ

 

 

अंतर्वेधी आकृतियाँ

ज्वालामुखी उद्गार से जो लावा निकलता है, उसके ठंडा होने से आग्नेय शैल बनती हैं। लावा का यह जमाव या तो धरातल पर पहुँच कर होता है या धरातल तक पहुँचने से पहले ही भूपटल के नीचे शैल परतों में ही हो जाता है।

 

 

आग्नेय शैलों का वर्गीकरण

1. ज्वालामुखी शैलों (जब लावा धरातल पर पहुँच कर ठंडा होता है)

2. पातालीय (Plutonic) शैल (जब लावा धरातल के नीचे ही ठंडा होकर जम जाता है)।

 

 

अंतर्वेधी आकृतियाँ :-

जब लावा भूपटल के भीतर ही ठंडा हो जाता है तो कई आकृतियाँ बनती हैं। ये आकृतियाँ अंतर्वेधी आकृतियाँ (Intrusive forms) कहलाती हैं।

 

 

 बैथोलिथ

 

यदि मैग्मा का बड़ा पिंड भूपर्पटी में अधिक गहराई पर ठंडा हो जाए तो यह एक गुंबद के आकार में विकसित हो जाता है। अनाच्छादन प्रक्रियाओं के द्वारा ऊपरी पदार्थ के हट जाने पर ही यह धरातल पर प्रकट होते हैं। ये विशाल क्षेत्र में फैले होते हैं और कभी-कभी इनकी गहराई भी कई कि0मी0 तक होती है। ये ग्रेनाइट के बने पिंड हैं। इन्हें बैथोलिथ कहा जाता है जो मैग्मा भंडारों के जमे हुए भाग हैं

 

 

लैकोलिथ

ये गुंबदनुमा विशाल अन्तर्वेधी चट्टानें हैं जिनका तल समतल व एक पाइपरूपी वाहक नली से नीचे से जुड़ा होता है। कर्नाटक के पठार में ग्रेनाइट चट्टानों की बनी ऐसी ही गुंबदनुमा पहाड़ियाँ हैं। यह लैकोलिथ के उदाहरण है।

 

 

लैपोलिथ

ऊपर उठते लावे का कुछ भाग क्षैतिज दिशा में पाए जाने वाले कमजोर धरातल में चला जाता है। यहाँ यह अलग-अलग आकृतियों में जम जाता है। यदि यह तश्तरी (Saucer) के आकार में जम जाए, तो यह लैपोलिथ कहलाता है।

 

 

फैकोलिथ

कई बार अन्तर्वेधी आग्नेय चट्टानों की मोड़दार अवस्था में अपनति के ऊपर व अभिनति के तल में लावा का जमाव पाया जाता है। ये परतनुमा / लहरदार चट्टानें एक निश्चित वाहक नली से मैग्मा भंडारों से जुड़ी होती हैं। (जो क्रमशः बैथोलिथ में विकसित होते हैं) यह ही फैकोलिथ कहलाते हैं।

 

 

 सिल

अंतर्वेधी आग्नेय चट्टानों का क्षैतिज तल में एक चादर के रूप में ठंडा होना सिल या शीट कहलाता है। कम मोटाई वाले जमाव को शीट व घने मोटाई वाले जमाव सिल कहलाते हैं।

 

 डाइक

जब लावा का प्रवाह दरारों में धरातल के लगभग समकोण होता है और अगर यह इसी अवस्था में ठंडा हो जाए तो एक दीवार की भाँति संरचना बनाता है। यही संरचना डाइक कहलाती है। पश्चिम महाराष्ट्र क्षेत्र की अंतर्वेधी आग्नेय चट्टानों में यह आकृति बहुतायत में पाई जाती है।

 

 

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