अध्याय 8 : धर्मनिरपेक्षता / Secularism

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★ धर्म :- किसी व्यक्ति या वस्तु में सदा रहने वाली उसकी मूल वृत्ति, प्रकृति, स्वभाव, मूल गुण अथवा किसी जाति, वर्ग, पद आदि के लिए निश्चित किया हुआ कार्य या व्यवहार, कर्त्तव्य; धर्म कहलाता है।

 

धर्मनिरपेक्षता – किसी भी धर्म विशेष से दूर रहते हुए सभी धर्मों का समान आदर करना ही ‘धर्मनिरपेक्षता’ कहलाती है।

 

★ धर्म निरपेक्ष और पंथनिरपेक्ष 

● धर्म निरपेक्ष :- धर्म निरपेक्ष का अर्थ है नैतिकता से निरपेक्ष होना धर्मनिरपेक्षता का आशय है कि राज्य सभी धर्मो से दूरी बनाकर रहे।

● पंथनिरपेक्ष :- पंथनिरपेक्ष का अर्थ है किसी मजहव विशेष के प्रति भेदभाव न करना इस दृष्टि से धर्म निरपेक्षता एक अनुचित धारणा है जबकि पंथनिरपेक्षता उचित है

 

 

भारतीय धर्मनिरपेक्षता क्या 

1. पहला :- कोई भी धर्मिक समुदाय किसी दूसरे धार्मिक समुदाय को न दबाए कुछ लोग अपने ही धर्म के अन्य सदस्यों को न दबाएँ।

2. दूसरा :- राज्य न तो किसी खास धर्म को थोपेगा और न ही लोगों की धर्मिक स्वतंत्रता छिनेगा।

3. तीसरा :- भारतीय राज्य की बागडोर न तो किसी एक धार्मिक समूह के हाथों में है और न ही राज्य किसी एक धर्म को समर्थन देता हैं।

4. चौथा :- भारत में कचहरी, थाने, सरकारी विद्यालय, दफ्तर जैसी सरकारी संस्थानों में किसी खास धर्म को प्रोत्साहन देने या उसका प्रदर्शन करने की अपेक्षा नही की जाती है। और

5. पाँचवा :- भारतीय राज्य इस बात को मान्यता देता है कि पगड़ी पहनना सिख धर्म की प्रथाओं के मुताबिक महत्वपूर्ण है। धार्मिक आस्थाओं में दखलंदाजी से बचने के लिए राज्य ने कानून में रियायत दे दी है।

6. छठा :- भारतीय संविधान धार्मिक समुदायों को अपने स्कूल और कॉलेज खोलने का अधिकार देता है। गैर-प्राथमिकता के आधार पर राज्य से उन्हें सीमित आर्थिक सहायता भी मिलती है।

 

 

 ★धर्म निरपेक्ष राज्य :-

● धार्मिक भेदभाव रोकने का एक रास्ता यह हो सकता है कि हम आपसी जागरूकता के लिए एक साथ मिलकर कार्य करें।

● एक राष्ट्र में धार्मिक वर्चस्व व भेदभावों को रोकने के लिए यह जरूरी होता है कि राज्यसत्ता किसी विशेष धर्म के प्रमुखों द्वारा संचालित नहीं होनी चाहिए।

● यदि हमारे लिए शान्ति, स्वतन्त्रता और समानता का कोई महत्व है, तो धार्मिक संस्थाओं और राज्यसत्ता की संस्थाओं के बीच दूरी अवश्य होनी चाहिए।

● वास्तव में धर्मनिरपेक्ष होने के लिए राज्यसत्ता को न केवल धर्म-संचालित होने से इंकार करना होगा बल्कि उसे किसी भी धर्म के साथ किसी भी तरह के औपचारिक कानूनी गठजोड़ से भी परहेज करना होगा।

● धर्मनिरपेक्ष राज्य को उन सिद्धान्तों के प्रति ज्यादा झुका हुआ होना चाहिए, जो किसी धार्मिक स्रोत से उत्पन्न न हुए हों। इन सिद्धान्तों में शान्ति, धार्मिक स्वतन्त्रता इत्यादि को शामिल किया जा सकता है।

 

 

★ धर्म निरपेक्षता का यूरोपीय मॉडल :-

●सभी धर्मनिरपेक्ष राज्यों में एक बात सामान्य होती है कि वे किसी भी विशेष धर्म की स्थापना से बचते हैं और धार्मिक कानूनों से संचालित नहीं होते हैं।

● 20वीं सदी के प्रारम्भ में तुर्की में ‘कमाल अतातुर्क’ ने धर्मनिरपेक्षता के नये रूप को प्रस्तुत किया। यह धर्मनिरपेक्षता संगठित धर्म से दूरी बनाने की बजाय धर्म में हस्तक्षेप करके उसके विनाश का पक्ष प्रस्तुत करती थी।

●धर्मनिरपेक्ष राज्य किसी धार्मिक संस्था एवं धर्म के आधार पर संचालित शिक्षण संस्थाओं को कोई वित्तीय मदद भी नहीं दे सकता।

● यहूदियों को छोड़ दिया जाए तो बाकी अधिकांश पश्चिमी समाज काफी हद तक धार्मिक रूप से सजातीय थे।

 

 

 

★ धर्मनिरपेक्षता का भारतीय मॉडल :-

● पं. जवाहरलाल नेहरू ने भारत में धर्मनिरपेक्षता का आशय स्पष्ट करते हुए कहा था कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता का मतलब ‘सभी धर्मों को राज्य द्वारा समान संरक्षण’ दिया जाना है।

● भारतीय धर्मनिरपेक्षता पर पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता की नकल होने का आरोप लगाया जाता है। लेकिन वास्तव में भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से बुनियादी रूप में भिन्न है।

● यह धर्म और राज्य के आपसी सम्बन्धों के विच्छेद के साथ-साथ सभी धर्मों के साथ समान आचरण पर भी बल देती है। धार्मिक विविधता के चलते भारत में पहले से ही अन्तर-धार्मिक सहिष्णुता की संस्कृति विद्यमान थी। यह धार्मिक वर्चस्व की विरोधी नहीं है।

● भारतीय धर्मनिरपेक्षता अपने आप में विशिष्ट है क्योंकि पहले से व्याप्त भारतीय धार्मिक विविधता और पश्चिम से आए विचारों का इसमें उचित मिश्रण विद्यमान है।

● भारतीय धर्मनिरपेक्षता का सम्बन्ध व्यक्तियों की धार्मिक आजादी से ही नहीं बल्कि अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक आजादी से भी है।

● धर्मनिरपेक्ष राज्य के लिए यह सदैव जरूरी नहीं होता है कि वह धर्म की हर बात को एक जैसा सम्मान प्रदान करे। यदि कुछ बातें अमानवीय या गलत हैं तो धर्मनिरपेक्ष राज्य उनमें हस्तक्षेप कर सकता है।

● भारतीय धर्मनिरपेक्षता धर्म से सैद्धान्तिक दूरी कायम रखने पर चलती है, जो हस्तक्षेप की सम्भावना भी उत्पन्न करती

 

 

★ धर्म के अंदर वर्चस्व :-

● कुछ लोग धर्म को जनसमुदाय के लिए अफीम मानते हैं। इनका मानना है कि जिस दिन सभी लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी हो जाएंगी वे खुशहाल हो जाएंगे तो धर्म स्वतः ही विलुप्त हो जाएगा।

● हमारे सभी दुःख-दर्द हमारे हाथ में नहीं हैं। इनमें धर्म ही हमें सहारा और हिम्मत देता है। धर्मनिरपेक्षता इस बात को स्वीकार करती है।

● हमारे पास आज धर्मनिरपेक्षता की आम धारणा मौजूद है। यह धारणा धर्म से जुड़ी समस्याओं और भेदभावों के निदान में बहुत उपयोगी है।

● धर्मनिरपेक्षता एक ऐसा नियामक सिद्धान्त है जो धर्म के भीतरी और बाहरी दोनों ही वर्चस्वों से रहित समाज का निर्माण करना चाहता है।

 

 

★ धर्मनिरपेक्षता का भारतीय मॉडल:-

● भारतीय धर्म निरपेक्षता केवल धर्म और राज्य के बीच संबंध विच्छेद पर बल नहीं देता।

● अप्लसंख्यक तथा सभी व्यक्तियों को धर्म अपनाने की आजादी देता है।

● भारतीय राज्य धार्मिक अत्याचार का विरोध करने हेतु धर्म के साथ निषेधात्मक संबंध भी बना सकता है।

● भारतीय संविधान ने अल्पसंख्यकों को खुद अपनी समस्याएं खोजने का अधिकार है तथा राज्यसत्ता के द्वारा सहायता भी मिल सकती हैं।

● भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 42वें संशोधन 1976 के बाद पंथ निरपेक्ष शब्द जोड़ दिया है।

● मौलिक अधिकारों में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, समानता का अधिकार शिक्षा व सांस्कृति का अधिकार सभी धर्मों को समान अवसर प्रदान करते हैं।

 

 

 

★धर्मों के बीच वर्चस्ववाद :-

● हर भारतीय नागरिक को देश के किसी भी भाग में आज़ादी और प्रतिष्ठा के साथ रहने का अधिकार है फिर भी भेदभाव के अनेक उदाहरण पाए जाते है

● जिससे धर्मों के बीच वर्चस्ववाद बढ़ा क्योंकि हमें स्वयं के धर्म को श्रेष्ठ मानते हैं।

● 1984 के सिख दंगों में हजारों सिख मारे गए,

● कश्मीर से कश्मीरी पण्डितों को निकाल दिया।

● 2002 में गुजरात में अनेक मुसलमान मारे गए तथा स्थान छोड़ कर चले गए।

 

 

★ धर्मनिरपेक्षता का अर्थ :-

● धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि राज्य राजनीति या किसी गैर-धार्मिक मामले से धर्म को दूर रखे तथा सरकार धर्म के आधार पर किसी से भी कोई भेदभाव न करे।

● धर्मनिरपेक्षता का अर्थ किसी के धर्म का विरोध करना नहीं है बल्कि सभी को अपने धार्मिक विश्वासों एवं मान्यताओं को पूरी आज़ादी से मानने की छूट देता है।

● धर्मनिरपेक्ष राज्य में उस व्यक्ति का भी सम्मान होता है जो किसी भी धर्म को नहीं मानता है।

● धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में धर्म, व्यक्ति का नितांत निजी मामला है, जिसमे राज्य तब तक हस्तक्षेप नहीं करता जब तक कि विभिन्न धर्मों की मूल धारणाओं में आपस में टकराव की स्थिति उत्पन्न न हो।

 

 

★ धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में संवैधानिक दृष्टिकोण :-

● भारतीय परिप्रेक्ष्य में संविधान के निर्माण के समय से ही इसमें धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा निहित थी जो सविधान के भाग-3 में वर्णित मौलिक अधिकारों में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद-25 से 28) से स्पष्ट होती है।

● भारतीय संविधान में पुन: धर्मनिरपेक्षता को परिभाषित करते हुए 42 वें सविधान संशोधन अधिनयम, 1976 द्वारा इसकी प्रस्तावना में ‘पंथ निरपेक्षता’ शब्द को जोड़ा गया।

● यहाँ पंथनिरपेक्ष का अर्थ है कि भारत सरकार धर्म के मामले में तटस्थ रहेगी। उसका अपना कोई धार्मिक पंथ नही होगा तथा देश में सभी नागरिकों को अपनी इच्छा के अनुसार धार्मिक उपासना का अधिकार होगा। भारत सरकार न तो किसी धार्मिक पंथ का पक्ष लेगी और न ही किसी धार्मिक पंथ का विरोध करेगी।

● पंथनिरपेक्ष राज्य धर्म के आधार पर किसी नागरिक से भेदभाव न कर प्रत्येक व्यक्ति के साथ समान व्यवहार करता है।
भारत का संविधान किसी धर्म विशेष से जुड़ा हुआ नहीं है।

 

 

★ भारतीय धर्मनिरपेक्षता तथा पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता के बीच अंतर :-

● पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता जहाँ धर्म एवं राज्य के बीच पूर्णत: संबंध विच्छेद पर आधारित है, वहीं भारतीय संदर्भ में यह अंतर-धार्मिक समानता पर आधारित है।

● पश्चिम में धर्मनिरपेक्षता का पूर्णत: नकारात्मक एवं अलगाववादी स्वरूप दृष्टिगोचर होता है, वहीं भारत में यह समग्र रूप से सभी धर्मों का सम्मान करने की संवैधानिक मान्यता पर आधारित है।

 

 

★ धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार | Right To Freedom Of Religion 

● भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25, 26, 27 और 28 के तहत नागरिकों और गैर-नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान किया गया है। संविधान में ‘धर्म’ शब्द को निर्माताओं द्वारा परिभाषित नहीं किया गया है और इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए एक समझ परिभाषा दी है।

● अनुच्छेद 25: यह अनुच्छेद अंतरात्मा की स्वतंत्रता और सभी व्यक्तियों को समान रूप से धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, अभ्यास करने और प्रचार करने का अधिकार प्रदान करता है।

● अनुच्छेद 26: इस अनुच्छेद के तहत, प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी भी उद्देश्यों के लिए संस्थानों की स्थापना और रखरखाव करना। धर्म से संबंधित मामलों में अपने मामलों का प्रबंधन करने के लिए।

● अनुच्छेद 27: इस अनुच्छेद में कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति को किसी विशेष धर्म या धार्मिक संप्रदाय के प्रचार या रखरखाव के लिए किसी भी प्रकार के करों का भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा।

● अनुच्छेद 28: इस अनुच्छेद के तहत, कोई भी शैक्षणिक संस्थान जो पूरी तरह से राज्य के धन से संचालित होता है, उसे कोई धार्मिक निर्देश नहीं देना चाहिए।

 

 

 

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